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सिरोही @ अर्बुदांचल। पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती महाराज का वर्धन्ती दिवस 30 अगस्त को श्री मनोरमा गोलोकतीर्थ नंदगांव (केसुआ), जिला सिरोही में भव्य एवं दिव्य रूप से मनाया जाएगा। आयोजन में संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं और सनातन धर्मावलंबियों की सहभागिता रहेगी। यह अवसर केवल जन्मदिवस समारोह नहीं, बल्कि तप, त्याग, ज्ञान, गुरु-भक्ति और लोकसेवा से निर्मित एक साधक की प्रेरणादायी जीवनयात्रा को नमन करने का अवसर होगा।
बरगी की धरती से शुरू हुई आध्यात्मिक यात्रा
स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज का जन्म 13 अगस्त 1958 को मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जनपद में करकबेल के समीप बरगी ग्राम में हुआ। उनके पिता आयुर्वेदरत्न पंडित श्री विद्याधर अवस्थी और माता श्रीमती मानकुँवर देवी थीं। बाल्यकाल से ही उनमें धर्म, आध्यात्म और ज्ञान के प्रति विशेष रुचि दिखाई देने लगी थी।
समय के साथ यही संस्कार उन्हें संस्कृत और शास्त्रों की ओर ले गए। नरसिंहपुर क्षेत्र के झोतेश्वर स्थित ज्योतिरीश्वर ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्हें ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यही सान्निध्य आगे चलकर उनके जीवन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
1977 में ब्रह्मचर्य दीक्षा, 2003 में दण्डसंन्यास
महाराजश्री के जीवन में वर्ष 1977 एक महत्वपूर्ण अध्याय लेकर आया। प्रयाग कुम्भ के अवसर पर गुरुदेव स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज ने उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा प्रदान की और वे ‘सदानन्द ब्रह्मचारी’ कहलाए।
दीर्घकालीन साधना और गुरुसेवा के बाद 15 अप्रैल 2003 को काशी में उन्हें दण्डसंन्यास की दीक्षा मिली। इसके साथ वे ‘स्वामी सदानन्द सरस्वती’ के रूप में संन्यास परम्परा में प्रतिष्ठित हुए।
वर्ष 2022 में ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद उनकी गुरु-परम्परा को आगे बढ़ाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज के कंधों पर आई।
शास्त्रीय परम्परा के अनुसार द्वारका में उनका पीठारोहण एवं महाभिषेक सम्पन्न हुआ और वे पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इसके साथ ही उनके सामने आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य की परम्परा, अद्वैत वेदान्त, सनातन धर्म और भारतीय ज्ञानधारा के संरक्षण का व्यापक दायित्व आया।
शिक्षा से गोसेवा और चिकित्सा तक सेवा का विस्तार
महाराजश्री की जीवनयात्रा केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रही। शिक्षा, संस्कृत, गुरुकुल, गोसेवा, चिकित्सा और समाजसेवा से जुड़े विभिन्न कार्यों को उन्होंने महत्व दिया।
गुरुकुलों एवं शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से विद्यार्थियों को संस्कारयुक्त शिक्षा और वेद-व्याकरण-ज्योतिष-साहित्य जैसे विषयों के अध्ययन का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य हुआ। वहीं शारदापीठ गोशाला के माध्यम से गौसेवा एवं गौवंश संरक्षण को भी सेवा-साधना का हिस्सा बनाया गया।
झोतेश्वर स्थित शंकराचार्य नेत्रालय के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को नेत्र चिकित्सा सहित आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास भी किए गए। निर्धन एवं जनजातीय क्षेत्रों के बच्चों तक शिक्षा और संस्कार पहुंचाने की दिशा में भी विभिन्न प्रयास किए गए।
30 अगस्त को पथमेड़ा में श्रद्धा का संगम
इसी तप, त्याग, साधना और सेवा की जीवनगाथा को नमन करने के लिए 30 अगस्त को श्री मनोरमा गोलोकतीर्थ नंदगांव (केसुआ), जिला सिरोही में वर्धन्ती दिवस का आयोजन किया जाएगा। आयोजन सनातन परम्परा, गुरु-शिष्य संबंध और भारतीय आध्यात्मिक विरासत के प्रति श्रद्धा का अवसर बनेगा।
बरगी के एक छोटे से ग्राम से शुरू हुई यात्रा झोतेश्वर के गुरुकुल, काशी के शास्त्राध्ययन, प्रयाग की ब्रह्मचर्य दीक्षा और संन्यास की साधना से होती हुई द्वारका के जगद्गुरु शंकराचार्य पद तक पहुंची।
तप से तेज, ज्ञान से प्रकाश और सेवा से लोकमंगल—स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज की यह जीवनयात्रा गुरु-परम्परा और भारतीय आध्यात्मिक चेतना की निरंतरता का प्रेरणादायी अध्याय प्रस्तुत करती है।
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